posted by Guruji Dharamveer Attri

Ketu | Vastu Cosmos | Guruji Dharamveer Attri | Vastu Scholar | Astrology Expert
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ज्योतिष में केतु अच्छी व बुरी आध्यात्मिकता एवं पराप्रा कृति क प्रभावों का का र्मिक संग्रह का द्योतक है।केतु विष्णु के मत्स्य अवतार से संबंधित है।केतु भावना भौति की करण के शोधन के आध्यात्मिक प्रक्रिया का प्रतीक है और हानिकारक और लाभदायक, दोनों ही ओर माना जाता है, क्योंकि ये जहां एक ओर दुःख एवं हानि देता है , वहीं दूसरी ओर एक व्यक्ति को देवता तक बना सकता है ।यह व्यक्ति को आध्यात्मिकता की ओर मोड़ने के लिये भौतिक हानि तक करा सकता है ।यह ग्रह तर्क, बुद्धि, ज्ञान, वैराग्य, कल्पना, अंतर्दृष्टि, मर्मज्ञता, विक्षोभ और अन्य मानसिक गुणों का कारक है ।माना जाता है कि केतु भक्त के परिवार को समृद्धि दिलाता है , सर्पदंश या अन्य रोगों के प्रभाव से हुए विष के प्रभाव से मुक्ति दिलाता है ।ये अपने भक्तों को अच्छा स्वास्थ्य , धन-संपदा व पशु-संपदा दिलाता है ।मनुष्य के शरीर में केतु अग्नि तत्व का प्रति निधित्व करता है ।ज्योतिष गणनाओं के लिए केतु को कुछ ज्योतिषी  इसे नर ग्रह मानते हैं ।केतु स्वभाव से मंगल की भांति ही एक क्रूर ग्रह हैं तथा मंगल के प्रतिनिधित्व में आने वाले कई क्षेत्रों का प्रतिनिधि त्व केतु भी करता है ।यह ग्रह तीन नक्षत्रों का स्वामी है: अश्विनी, मघा एवं मूल नक्षत्र।यही केतु जन्म कुण्डली में राहु के साथ मिल कर काल सर्प योग की स्थिति बनाता है ।

इन क्षेत्रों के अतिरिक्त केतु जिन क्षेत्रों तथा लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं उन में आध्यात्मत था आध्यात्मिक रुप से विकसित लोग, पराशक्तियों के क्षेत्र तथा इनकी जानकारी रखने वाले लोग, दवा एं बनाने वाले लोग तथा दवाओं की बिक्री करने वाले लोग, अनुसंधान के क्षेत्र में काम करने वाले लोग, मानवीय इतिहास पर खोज करने वाले लोग, अनाथालय तथा इनके लिए काम करने वाले लोग और संस्थाएं, वृद्धआश्रम तथा इनके लिए काम करने वाली संस्थाएं, धार्मिक संस्थाएं तथा इनके लिए काम करने वाले लोग, पादरी, जासूस, इतिहासकार, पुरातत्त्ववेत्ता, भूविज्ञानी, गणितज्ञ तथा अन्य कई क्षेत्र, संस्थाएं और व्यक्ति आते हैं ।इसके अतिरिक्त केतु नवजात शिशुओं तथा विशेष रूप से नर शिशुओं, कम उम्र के नर बच्चों, चेलों अथवा शिष्यों, कुत्तों, मुकद्दमे बाजी तथा मुकद्दमों, यात्राओं, वृद्ध लोगों, मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों तथा किसी बाहरी बाधा से पीड़ित लोगों के भी कारक माने जाते हैं ।

दूषित या निर्बल केतु के प्रभाव : 

ज्‍योतिष शास्‍त्र में केतु को भी ग्रह की संज्ञा दी गई है ।अगर किसी की कुंडली में केतु अशुभ हो जाए तो उस व्‍यक्‍ति के जीवन में सब कुछ अशुभ घटने लगता है ।वो बुरी आदतों का शिकार हो जाता है और इस वजह से उस के मान-सम्‍मान में भी कमी आती है ।

केतु के प्रकोप की वजह से व्‍यक्‍ति अपनी सारी पूंजी और कमाई को बर्बाद कर देता है ।केतु के अशुभ प्रभाव के कारण व्‍यक्‍ति दुराचारी और बलात्‍कारी तक बन सकता है ।इसके अलावा मुकदमे में फंसना, अनावश्‍यक झगड़े, वैवाहिक जीवन में कलह, भूत-प्रेत बाधा आदि केतु के अशुभ प्रभाव का कारण है ।

कुंडली में केतु का अशुभ प्रभाव शारीरिक कष्‍ट और रोग भी देता है ।इससे पथरी, गुप्‍त और असाध्‍य रोग, खांसी और पित्त विकार संबंधी रोग घेर लेते हैं ।

केतु ग्रह का रत्न लहसुनिअया कैट्स आई

लहसुनिया रत्न शत्रुता का भाव रखने वाले क्रूर ग्रह केतु से संबंधित होता है जिसके चलते यह बहुत महत्वपूर्ण व अमूल्य होता है ।जातक की जन्म कुंडली में केतु की संदिग्ध व हावी स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि उसे लहसुनिया रत्न को धारण कर लेना चाहिए ।लहसुनिया एक ऐसा रत्न है जो आध्यात्मिक गुणों के लिए जाना जाता है ।यह केतु के दोष पूर्ण प्रभाव से दूर करने में मदद करता है और बढ़ती ठंड के कारण शरीर में होने वाली बीमारियों को भी कम करता है ।केतु मुख्यतः वक्रिय स्थिति में रहता है और जब कुंडली में प्रधान होकर स्थित होता है तब वह अप्रत्याशित लाभ व फायदे लेकर आता है।  लहसुनिया या  वैद्युर्या को क्रिस्स बैरिल परिवार का सदस्य माना जाता है इसलिए इसे क्रिस्बरी लकैट्स आई भी कहा जाता है ।यह कई रंगों जैसे मट मैला पीला, भूरा, शहद की तरह भूरा, सेब की तरह हरे रंग में उपलब्ध होता है ।यह रत्न अपनी चमक के लिए जाना जाता है ।लहसुनिया कै बोकाॅन रूप में कटा होता है जिस कारण इसके ऊपर पड़ने वाला प्रकाश एक लंबी रेखा के रूप में दिखाई देता है ।इस रत्न के प्रभाव से जातक का मोह-माया व विलास आदि से मन हट जाता है और वह अध्यात्म की ओर झुकने लग जाता है ।

धयान रहे   : लहसुनिया धारण करने से पहले किसी विद्वान्ज्योतिष से कुंडली की विवेचना अति आवश्यक है |

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